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Rasa Ganga Dhara (रसगङ्गाधरः प्रथमानन)

Original price was: ₹200.00.Current price is: ₹160.00.

Author Dr. Ramadhar Sharma
Publisher Bharatiya Book Corporation
Language Sanskrit & Hindi
Edition 1st edition, 2018
ISBN 978818512271-7
Pages 424
Cover Paper Back
Size 13 x 2 x 21 (l x w x h)
Categories: ,

Description

रसगङ्गाधरः प्रथमानन (Rasa Ganga Dhara) यह साहित्यशास्त्र का मूर्धन्य ग्रन्थ है। रसस्वरूप गङ्गा को धारण करने वाला- ‘रसञ्चासौ गङ्गा रसगङ्गा, तस्याः धरः (धारकः), धरतीति घर इति’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार यह रसप्रतिपादक के रूप में साक्षात् शिव (गङ्गाधर) ही है। तदनुसार इसका विषय रस है, जो साहित्यशास्त्र में सर्वप्रधान होने से अपने शास्त्रमात्र का संग्राहक हो जाता है, इस शाख के सभी तत्त्वों का प्रतिनिधित्व करता है- ‘प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति’- प्रधान के अनुसार ही व्यवस्था होती है, इस न्याय के अनुसार साहित्यशास्त्र का नाम रसशास्त्र [“रसविद्याविदः केचिद् ग्राम्यामाहुस्तु कोमलाम्” (अलङ्कारसमुद्गः इन्द्रपतिः पृ०६)] होता है और इसे ही पण्डितराज जगन्नाथ ने इस ग्रन्थ का रसगङ्गाधर नाम रखकर सूचित किया है।

परन्तु वे परम्परानुसार प्रचलित नाम “अलङ्कारशाख” कहना [“अलङ्कारान् सर्वानपिगलितगर्वान् रचयतु”। (रसगङ्गाधर आरम्भिक पद्य)] ही उचित समझते हैं और यह नाम भी प्राधान्य न्याय से ही सङ्गत होता है, क्योंकि इस शास्त्र का आधा से अधिक भाग अलङ्कार-विवेचन में ही रहता है। परन्तु आधुनिक युग में ‘साहित्य’ शब्द अधिक प्रचलित है, जो राजशेखर ने अपने काव्यमीमांसा में कहा है- “शब्दार्थयोर्यावत् सहभावेन विद्या साहित्यविद्या”। इसी प्रकार श्रीहर्ष ने भी अपने नैषधीयचरित के अन्त में-“साहित्ये सुकुमारवस्तुनि”।

इत्यादि के द्वारा समर्थित है। साहित्य के प्रसङ्ग में महामहोपाध्याय गङ्गाधर शास्त्री का एक पद्य यहाँ उद्धरणीय है-

नाचान्तं यच्चिरत्नैरपरिचितचरं यच्च वाचालचेलै-
रौचित्यं यन्त मुञ्चेदपि च विरचयेद् यच्चमत्कारिचेतः।
तादृक्‌प्रौढिप्रकर्षप्रणय भणिति या सूयते काव्यरलं
पुण्यैः कस्याप्यगण्यैः परिणमति मुखे सा हि साहित्यरीतिः।। (विश्वमनीषा-२-२)

इस विवेचन से स्पष्ट हुआ कि साहित्य के सभी तत्त्व रसगङ्गाधर के विवेचनीय विषय हुआ और वे सभी विषय यहाँ सूक्ष्म रूप से विस्तृत विवेचित हुए है। पर खेद का विषय है कि यह ग्रन्थरत्न पूर्णरूप में उपलब्ध नहीं है। अन्तभाग में कुछ खण्डित है, जिसमें कुछ अलङ्कारों का विवेचन था। मध्य में भी कुछ प्रकरण त्रुटित जान पड़ते हैं; यथा-अभिधा और लक्षणा के बाद व्यञ्जनानिरूपण नहीं है, रीतिविवेचन और दोषनिरूपण नहीं है। यह बात भी ध्यातव्य है कि ग्रन्थ के अध्याय, जिसे आनन कहा गया है, उसका विभाजन भी उपयुक्त नहीं जान पड़ता है। अतः स्पष्ट है कि प्रतिलिपिकारों के द्वारा इस ग्रन्थ के पन्नों में हेरा-फेरी हुई है। गङ्गाधर (शिव) पञ्चानन कहे गये हैं। तदनुसार इस रसगङ्गाधर के भी पाँच आनन होने चाहिए।

यहाँ द्वितीय आनन के बाद बहुत दूर तक विषय एवं प्रकरण बदलने पर भी आनन विभाजन नहीं हुआ है, जो मध्य में ग्रन्थ के कुछ अंश के अप्राप्त होने की सूचना देते हैं। प्रथम आनन में काव्य, उसके भेद एवं असंलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्यध्वनि (अभिधामूलध्वनि के प्रथम भेद, रसध्वनि) का साङ्गोपाङ्ग विवेचन (रस, गुण, भावध्वनि, रसाभासादि सहित) हुआ है। इस आधार पर द्वितीय आनन में संलक्ष्यक्रमव्यङ्गय (अभिधामूलध्वनि के द्वितीय भेद, जिसमें वस्तुध्वनि और अलङ्कार-ध्वनि अन्तर्भूत है) का, तृतीय आनन में लक्षणामूलध्वनि का, चतुर्थ आनन में व्यञ्जना का और पञ्चम आनन में अलङ्कारों की विवेचन की कल्पना की जा संकती है।

काव्यदोष का निरूपण यद्यपि आवश्यक है, क्योंकि दोष-परित्याग तभी सम्भव है जब उसका परिचय हो, तथापि पण्डितराज ने अपनी विवशतावश उसका निरूपण नहीं किया होगा। विवशता यह थी कि ग्रन्थारम्भ में ही इनकी प्रतिज्ञा है कि हम स्वरचित उदाहरण ही देंगे, दूसरे का नहीं और दुष्ट काव्य का निर्माण पण्डितराज की लेखनी से हो ही नहीं सकता। इसलिए दोषनिरूपण इस ग्रन्थ में नहीं रहा होगा। परन्तु अभी जो ग्रन्थ उपलब्ध है, जिस रूप में प्राप्त है, उसीसे सन्तोष करना होगा, उसी पर विचार करना उचित होगा।

नव्यपरिष्कृत आलोचनात्मक शैली में विषय की सूक्ष्मता से परिचय कराना पण्डितराज की अद्भुत प्रतिभा का परिचायक है। इस ग्रन्थ के द्वारा इन्होंने साहित्यशास्त्र को वह गरिमा प्रदान की जो दर्शनादि शास्त्रों की प्राप्त है। शास्त्रान्तर के पण्डित, जो इस विद्या को अन्यथा सिद्ध मानकर मखौल उड़ाते थे, इस ग्रन्थ के सूक्ष्म विवेचन के चक्कर में पड़कर इस शास्त्र के गहन अध्ययन करने को विवश हुए। यही है इस शास्त्र को पण्डितराज की देन तथा रसगङ्गाधर का महत्त्व।